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गांधीजी का करुण रस

विद्यानिवास मिश्र

उजाले की परछाई पूरा पढ गया। बहुत ही हृदय-द्रावक रचना है। इसको पढने पर लगा कि गांधीजी पर चर्चा का एक नया मुद्दा और जुड गया। गांधीजी गृहस्थ थे, साथ ही साथ लोक के लिए अर्पित थे। उनमें कठोरता और कोमलता का अद्भुत द्वंद्व था। इस रचना ने उस द्वंद्व को बार-बार छेडा है। गांधीजी के आदर्श़ों पर चर्चा करने के लिए, साथ ही उनके आदर्श़ों के अनुरूप भारत के स्वरूप पर चर्चा करने के लिए यह उपन्यास ऐसा अनछुआ प्रसंग जोडता है जिस पर लोगों का ध्यान नहीं जाता। लोगों ने गांधीजी के आत्ममंथन और गहरे विषाद को केवल एक ही स्तर पर देखा है, वह स्तर देश का है, देश के साथ-साथ पूरी सृष्टि का है। पर एक और धरातल है जो घर का है। गांधीजी निग्रहवादी थे, पर संन्यासी नहीं थे, परिवारी थे। अंत तक परिवारी रहे। आपने ठीक सोचा है कि कभी इस उपन्यास को बहाना बनाकर गांधी के इस पक्ष पर गहरी चर्चा हो। मैं इसे पढकर बार-बार "उत्तर रामचरित" का ध्यान करता रहा कि राम सीता को निर्वासित तो करते हैं, पर सीता के लिए भीतर ही भीतर बहुत व्यथित रहते हैं कि ऐसा भी राजधर्म क्या कि अपने स्नेह दया सुख और इन सबके निचोड के रूप में जानकी को छोडना पडा। आज भी यह प्रश्न उतना ही गहरा है कि यदि लोक के प्रति कर्तव्य और अपने अंतस्तल के लगाव में परस्पर विरोध होता है, तो किस रूप में उसका समाधान हो और किसकी बलि लेना दूरगामी ष्टि से अधिक श्रेयस्कर है। गांधीजी जिस देश के लिए खपे उस देश ने उनकी समाधि पर फूल चढाने के कर्मकाण्ड और उनके नाम पर एक दिन छुट्टी की घोषणा के सिवा किया क्या है ? गांधीजी को किसी न किसी रूप में परिवार का सदस्य मानने वाले लोगों ने किस रूप में उनके जाने के बाद अपने मन वचन कर्म में उन्हें उतारने की कोशिश की। हरिलाल को खलनायक मानना आज के पाखण्डी वातावरण में कितना संगत है - यह प्रश्न साहित्य के विद्यार्थी को बहुत सालता है।

2 अक्टूबर को गांधी का जन्मदिन सरकारी छुट्टी का दिन है और उनकी समाधि पर पुष्पमाला चढाने का दिन है। यह समाधि बाहर से आए सम्मानित राज्य-अतिथियों का पडाव भी है। वे हिंदुस्तान आएँगे तो उनके कार्यक्रम में यहां बडी सी माला भेंट करना अनिवार्य कर्मकांड है। गांधी का चित्र नोट पर छपता है और हर शहर में उनके नाम से एक सडक है। दो आश्रम भी उनके नाम के हैं - एक वर्धा में, एक साबरमती के किनारे अहमदाबाद में। उनके नाम से जहाँ तक मुझे ज्ञात हैं, तीन-तीन विश्वविद्यालय हैं। और जहाँ तक मुझे मालूम है, उन्होंने आजाद हिंदुस्तान की व्यवस्था की जो रूपरेखा तैयार की और उसे स्वाधीनता-प्राप्ति के कई दशक पहले प्रकाशित किया, न केवल उसकी चर्चा नहीं हुई, वह कहीं पाठय़क्रम में भी नहीं है। वैसे गांधी अध्ययन केन्ौ है, शायद हर विश्वविद्यालय में होगा; पर गांधी के चिंतन में जो नक्शा हिंदुस्तान का बना वह कहीं ताक पर रख दिया गया है। इससे बडी त्रासदी क्या होगी ! जिस समय देश का विभाजन हो गया और एकता का स्वप्न टूटने से नैराश्य के बावजूद गांधीजी सपने सँजो रहे थे कि किसी दिन यह अस्वाभाविक विभाजन जुडाव में परिवर्तित होगा और इसीलिए वे लोकप्रियता को दाँव पर चढाकर हमारी जो देनदारी पाकिस्तान पर थी उसे चुकता मनवाने पर अड गए, जिस पर बडा आक्रोश हुआ। अपने जीवन के अंतिम वर्ष में वे बिलकुल अकेले पड गए थे। उन्होंने एकाधिक बार प्रार्थना सभा में कहा, `लोग मुझे पागल समझते हैं। हाँए मैं पागल हो गया हूँ।` गांधीजी ऐसे अकेले नहीं थे। उनके पास दुर्दम्य आस्तिकता का संबल था और यह आस्तिकता भी स्वतंत्र भारत में करुणांत ही सिद्ध हुई। गांधीजी का समग्र विचार गांधीजी के साथ ही विदा हो गया। उन पर अमल करने का जिन्होंने व्रत लिया उन्होंने अतिरेक से काम लिया और गांधीवादी आंदोलन असहाय, निरुपाय आंदोलन में परिणत हुआ। इसकी एक दुंत कथा है। स्वतंत्र भारत ने स्वतंत्रता को स्वावलंबन से किस दिन से अलग किया, यह खोज का विषय है; पर परावलंब ही स्वाधीनता की रक्षा का उपाय हो गया तथा आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक रूपी स्तरों पर हिंदुस्तान आयात पर अवलंबित होता गया। निर्यात के नाम पर उसके पास नृत्य रह गया और साल में भेजे जाने वाले सद्भावना मंडल रह गए। गांधीजी नामशेष रह गए। उनके विचार यदि रहे भी तो निराकार में रहे। इस त्रासदी पर रचनात्मक चिंतन भी बहुत कम हुआ। जहां तक मुझे स्मरण है, उनकी मृत्यु पर सबसे सार्थक शोक गीति स्वर्गीय बालकृष्ण शर्मा `नवीन` ने लिखी थी, जिसमें उन्होंने गांधी की मृत्यु पर शोक नहीं, गांधी की हत्या करने की स्थिति, हत्या किस कारण हुई उस कारण पर-मानवता की मृत्यु पर उन्होंने शोक व्यक्त किया। यह मानवता क्या थी, इसके निहितार्थ क्या थे - इस पर एक पीढी गुजरी, दो पाढियाँ गुजरप, तीसरी पीढी सामने आ गई - कोई जुंबिश नहीं हुई। अभी-अभी मुझे दिनकर जोशी की पुस्तक का हिंदी अनुवाद `उजाले की परछाई` पढने को मिला। वैसे तो यह जीवन कथा गांधीजी के बडे पुत्र हरिलाल गांधी की है, जो गांधीजी के अत्यंत प्रिय बडे बेटे होकर और उनके दक्षिण अफ्रीका के अभियान को आगे बढाने के कारण छोटे गांधी होकर भी एक दिन बगावत पर उतर आए और एक भयंकर आकर्षण-विकर्षण के शिकार हुए। वे अपने पैरों पर खडे होने के लिए कोशिश करने लगे और लडखडाते ही चले गए। पर गांधीजी के आदर्श उनके सिर पर सवार रहे। वे परिवारी बनना चाहते थे, परिवारगविहीन होकर बेनाम मरे। गांधीजी के जाने के लगभग चारगपाँच महीने बाद। उनके लिए उनकी माँ जीवन भर बिलखती रहीं। गांधीजी के मन में भी अंतर्द्वंद्व रहा कि मुझसे क्या गलती हुई। उन्होंने तो अपने को एक बडे परिवार का कर्ता माना, इसलिए अपने बडे बेटे की उत्कट इच्छा होते हुए भी, किसी दूसरे का मुक्त निमंत्रण होते हुए भी कि आपके किसी एक लडके को लंदन में पढाना चाहता हूँगउन्होंने पहले तो एक भतीजे को भेजा, जो बीच में ही लौट आया, फिर एक पारसी सज्जन को भेजा। गांधीजी सोचते थे कि जो कठिन तप की शिक्षा उनके आश्रम में दी गई है, उससे बडी शिक्षा कोई नहीं है। हरिलाल गांधी अपनी कल्पना की शिक्षा के लिए तरसते ही रह गए। वे यह शिक्षा अपने लिए नहीं, अपने परिवार के लिए पाना चाहते थे। परिवार को आर्थिक ष्टि से स्वावलंबी बनाने के लिए प्राप्त करना चाहते थे। गांधीजी के मन में भी अवश्य अंतर्द्वंद्व रहा होगा और हरिलाल गांधी के लिए करुणा भी रही होगी। उन्होंने हरिलाल गांधी को दक्षिण अफ्रीका से विदा देते समय संबोधित करके कहा भी था - मुझसे कोई गलती हुई हो तो क्षमा करना।

ऐसा ही अंतर्द्वंद्व राम के मन में भी हुआ होगा, जब उन्होंने लोकापवाद की अधिक चिंता की और सीता को निर्वासित किया। हरिलाल गांधी सीता तो नहीं थे; पर जीवन में इतने अतिचारों के बावजूद वे अनगढ आजाद हीरा तो थे ही। नहीं तो माँ और पिता दोनों के अंतिम दर्शन करने वे दूर-दराज से खिंचे न आते। उनसे जो भी गलतियाँ हुइऔ उन गलतियों पर आज विचार होना आवश्यक है। गांधीजी हिंदुस्तान के आम आदमी के ही दुख से नहींए किसी भी पराधीन प्राणी के दुख से ौवित हो जाते थे। उनकी मानवता समस्त जड-चेतन को समेटकर क्रियाशील होती थी; पर वे अपने पुत्र के प्रति इतने अकरुण क्यों हुए ? यह सोचना कि उन्हें अपनी छवि की चिंता थी, सरासर अन्याय होगा। गांधीजी अपना सर्वस्व उत्सर्ग करनेवाली बा के प्रति भी कई बार अकरुण हुए। पर बा के लिए उनके मन में अगाध प्यार था। बा के जाने के बाद गांधीजी की ऊर्जा आधी से अधिक चली गई, नहीं तो गांधीजी ने विभाजन होने नहीं दिया होता, अकेले उनमें इतना दम था। गांधीजी को अपनी छवि की चिंता नहीं थी, ऐसे देश की छवि की चिंता थी जो देश के बाहर के बारे में सोचने का भी अभ्यासी रहा। जो गांधी बकरी को परिवार का अंग बना सकते थे वे गांधी अपने लडके के बारे में यह उद्घोषणा करें कि यह मेरा लडका नहीं रहा, इससे मेरा कोई संबंध नहीं है, बडा ही अकरुण निर्णय है।

यहीं पर गांधीजी का जीवन उस सनातन प्रश्न को छेडता है कि कितनी दूर तक लोक की चिंता और कितनी दूर तक अपने निजी संबंधों की चिंता। क्या इन दोनों में विरोध है ? यदि है तो क्या उसका समाधान नहीं है ? यह प्रश्न आज भी किसी भी संवेदनशील आदमी को उतना ही सालेगा जितना गांधीजी को सालता रहा होगा। एक प्रश्न और है जिस स्वदेशी का दर्शन गांधीजी ने दिया वह स्वदेशी देश के सौष्ठव से कितना जुडी। गांधीजी ने तो मन, हाथ और आंख तीनों के सहयोग को ही शिक्षा का प्रथम सोपान कहा। पर उन्होंने शायद चित्र को छोड दिया। नहीं तो महादेव देसाई गिरिसप्पा जलप्रपात देखना चाहते थे, उन्हें इसकी अनुमति नहीं मिली - तब रवपौ केडेकर ने गांधीजी के संबंध में एक लंबी चर्चा काका कालेलकर से की। वह चर्चा गांधीजी के अंतर्विरोधों को समझने में आज भी बडी उपयोगी है। आनंद कुमार स्वामी ने अपनी पुस्तक `आर्ट और स्वदेशी` में बहुत सारे मर्मभेदी प्रश्न छेडे। मैंने पृथ्वी सिंह आजाद से, जो गांधीजी के आश्रम में कुछ दिनों आश्रय लिये हुए थे, बहुत सी कथाएँ सुनी थप। उनसे मुझे लगा था कि विग्रह का अतिरेक कभी-कभी आसक्ति को उकसाता है। ऐसा क्यों होता है ? गांधीजी ने `गीता` पढी ही नहीं थी, गुनी भी थी और श्रीकृष्ण के निष्काम योग के वे साधक भी थे। पर उन्होंने कर्म के कौशल में तो सौंदर्य देखा, सौंदर्य में नियंता का कौशल क्यों नहीं देखा ?

जिस प्रकार के आर्थिक-सामाजिक ढाँचे की उन्होंने कल्पना की उसमें उत्सव का उल्लास क्यों नहीं रहा ? मैंने उनके दोनों आश्रमों को उनके जाने के बाद देखा। हृदयकुंज को भी, सेवाग्राम को भी। दोनों जड, दोनों में ऐसा तो लगता है कि गांधीजी कहीं उपस्थित हैं, पर बिहँसते हुए गांधी नहीं, थकेगहारे गांधी वहाँ उपस्थित हैं। सबसे अलग, बिछुडे हुए, धीरे-धीरे पहाड की ओर चढते हुए युधिष्ठिर की तरह गांधीजी चल रहे हैं - सब छूटते जा रहे हैं, कोई भी सगा आदमी साथ नहीं दे पाता। युधिष्ठिर ने धर्म की लडाई लडी; अन्याय न सहने की लडाई लडी, पर लडाई जीत जाने पर उन्हें विषाद ने घेरा। गांधीजी ने स्वाधीनता की लडाई लडी, भारत के स्वाधीन हो जाने पर उन्हें विषाद ने घेरा कि मैं इस स्वतंत्र भारत में कुछ दिशा-निर्देश नहीं दे सकता। मैं अप्रासंगिक हो गया हूँ। क्या अपने जीवन को एक निरंतर मंथन बनाने वाला गांधी जैसा आदमी अप्रासंगिक हो सकता है ? केवल भारत के लिए नहीं, विश्वमात्र के लिए ? और पशुबल के आगे हार न माननेवाला एक व्यक्ति स्वजनों से ऐसे हार मानने के लिए विवश होगा ? मुझे तो ऐसा लगता है कि हरिलाल गांधी का जीवन हरिलाल की त्रासदी नहीं, गांधीजी की भी त्रासदी है और शायद यह भारत की ही त्रासदी है। भारत जीतकर हारता रहा है और हारकर जीतता रहा है। इसकी संस्कृति की बुनावट में कहीं गहरी करुणा के बीज हैं। भारत में अद्भुत क्षमता है त्याग की, और उसी मात्रा में उसमें लोभ की प्रबलता भी है। यह लोभ कभी-कभी धर्म का लोभ होता है, प्रतिष्ठा का लोभ होता है, यह सकारात्मक लोभ हमें हमेशा मारता रहता है। चाहे जौहर के रूप में मारता रहा हो, चाहे पंचशील के उपदेष्टा के रूप में। ऐसे जटिल संरचनावाले भारत के विकास के बारे में कोई भी कल्पना करें, उसमें गांधी को अलग नहीं कर सकते, युधिष्ठिर को अलग नहीं कर सकते, राम और कृष्ण को अलग नहीं कर सकते, नवजात बच्चे के साथ सोई हुई यशोधरा को तजने वाले महाभिनिक्रमण के लिए प्रस्थित बुद्ध को अलग नहीं कर सकते, तितिक्षा का पाठ पढानेवाले उन महावीर के चिंतन को अलग नहीं कर सकते, जो सबसे अधिक धन और धन के भोग को आकृष्ट करता है। हिंदी में गिरिराज किशोर ने गांधीजी के दक्षिण अफ्रीका में किए गए अभियान का लेखा-जोखा `पहला गिरमिटिया` के रूप में प्रस्तुत किया है। पर दक्षिण अफ्रीका तो गांधीजी की प्राथमिक शाला थी। उसके बाद उनके सारे प्रयोग भारत में हुए। उन्होंने कोयले को ही अपनी ऊर्जा के ताप से हीरा बनाया और उनका अपना हीरा कोयला बन गया। हमारे देश में या तो उन्हें महिमा के आलोक में छिपा रखा है या फिर उनको प्रतिगामी, सर्वहारा का शत्रु, पूँजीवाद का हथियार आदि एक-से-एक लफ्फाजी भरे विशेषणों से घेर रखा है। गांधीजी दोनों नहीं थे, वे नर के भीतर नारायण की बेसँभाल व्यथा थे।

काश कि वह व्यथा आज देश के हृदय पर अंकित होती तो देश के चित्त का ऐसा संस्कार होता कि सारी खामियों के बावजूद हम सही माने में स्वाधीन होने के लिए खडे हो जाते। मन में इतना विश्वास अवश्य है कि एक-न-एक दिन गांधी की वह विराट व्यथा उसी तरह हमारे हृदय में करुणा की रसधार बनेगी जिस तरह `महाभारत` में युधिष्ठिर का विषाद बना; श्रीकृष्ण का अकेलापन बना; राजा राम की सीता के बिना जीवन की व्यर्थता का दुख बना। तभी देश का चित्त पखारा जाएगा और शुद्ध चित्त से देश के विकास की चिंता होगी।


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