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भारत में दलित प्रश्न और महात्मा गांधी

राकेश सक्सेना

भारत में दलित शब्द और उसका चलन भारत में अंग्रेजी राज की स्थापना के बाद में हुआ। भारत से विदेशों में जाकर पढ़ने वाले नौजवानों की बौद्धिक प्रतिभा में स्वतन्त्रता, समता, बन्धुत्व और राष्ट्रवाद की संकल्पनायें आत्मसात् हो रही थीं। भारत आकर ये नौजवान अपने देश और समाज को अपनी संकल्पानाओं के अनुरूप आकार देना चाहते थे। उसी क्रम में महाराष्ट्र में महादेव गोविंद रानडे और ज्योतिबा फुले के जागरण और समाज सुधारों की दिशा में एक नया आयाम तब जुड़ा जब अमेरिका से पढ़-लिखकर डॉ. अम्बेडकर ने महाराष्ट्र की पेशवाई तौर-तरीकों और व्यवस्थाओं के विरुद्ध एक वैचारिक और व्यवस्थित संघर्ष की शुरुआत की। इस संघर्ष के क्रम में डॉ. अम्बेडकर ने दलित शब्द का प्रयोग उन समूहों के लिए किया जो भारत की सामाजिक संरचना में अपने स्थान व निर्धारित भूमिकाओं के कारण स्वतन्त्रता व समता के मूल्यों का उपयोग करने में असमर्थ थे। इसमें शूद्र वर्ण के अन्तर्गत आनेवाली जातियाँ, वर्ण व्यवस्था से बाहर की जातियाँ और स्त्रियाँ शामिल थीं। लेकिन यह शब्द रूढ़ हुआ उन जातियों पर जाकर जिनसे समाज में छुआछूत का व्यवहार होता था या जो अस्पृश्य मानी जाती थीं। महाराष्ट्र के महार और उत्तर भारत के चमार व भंगी इत्यादि जैसी जातियों के बारे में दलित शब्द का प्रयोग बढ़ा है। डॉ. अम्बेडकर के व्यावहारिक संघर्षों में भी कुछ जातियाँ ही शामिल हो पायी थीं। यह शामिल जातियाँ ही अपने बारे में दलित शब्द का प्रयोग करने लगीं। इस प्रकार यह शब्द एक विशेष अर्थ का बोध कराता हुआ भाषाई चलन में शामिल हो गया। अम्बेडकर के प्रयासों के काल में राष्ट्रवाद की संकल्पना को आत्मसात कर भारतीय राष्ट्रवाद को जन्म देते हुए अपने प्रयासों में संलग्न महात्मा गांधी राष्ट्रीय क्षितिज पर नेतृत्व के रूप में प्रतिष्ठित हो रहे थे। उत्तर भारत में आर्य समाज के कार्यक्रमों में उन्हीं जातियों को जिन्हें अम्बेडकर का दलित शब्द अपने में शामिल करता था, उन्हें जनेऊ धारण कराकर, संस्कृत पढ़ाकर, यज्ञकर्ता बनाकर उनकी सामाजिक हैसियत को बदला जा रहा था। इसी उत्तर भारत में महात्मा गांधी ने उक्त जातियों को हरिजन कहकर सम्बोधित किया। उनके यहाँ जाकर रहना और अपने आश्रम में हर सवर्ण के कार्यों में भंगी के कार्यों को समाहित करना, यह था गांधी का रास्ता।

भारत में दलित प्रश्न का अम्बेडकरीय प्रस्तुतिकरण जब स्वतन्त्रता, समता के सवाल से बढ़कर ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में उतरा और मनुस्मृति दहन के कार्यक्रमों के रूप में सामने आया तब दलित का प्रश्न एक कौम का प्रश्न बनने लगा जिसकी दिशा अन्ततः एक स्वतन्त्र राष्ट्र की माँग की ओर बढ़ती है। ब्रिटिश राज्य की कार्य योजना में मुसलमानों के बाद दलितों को इसी दिशा की ओर बढ़ाना शामिल था। इसलिए पृथक निर्वाचन देकर मुसलमानों को मुस्लिम लीग के प्रयास और फिर पृथक राष्ट्र की माँग की ओेर बढ़ाने की नीति वह दलितों पर आजमाना चाहते थे। डॉ. अम्बेडकर अपने दलित समाज की मुक्ति की राहें खोजने में पृथक निर्वाचन को अपना सहायक मान बैठे थे लेकिन महात्मा गांधी एक राष्ट्रवादी चिन्तक के रूप में राष्ट्र विभाजन की इस अंग्रेजी चाल को समझ गये थे। इसीलिए आमरण अनशन पर बैठकर उन्होंने इस नये राष्ट्रीय विभाजन को रोकने का प्रयास किया। डॉ. अम्बेडकर ने जब गांधी से वार्तालाप किया तब वह भी इस बात को समझ गये और पूना पैक्ट के रूप में भारतीय समस्या का भारतीय समाधान निकाला गया यानि विधायिका में सुनिश्चित भागीदारी लेकिन निर्वाचक मण्डल पूरा समाज। कालान्तर में आरक्षण की संकल्पना इसी आधार पर उपजी जो अम्बेडकर  के साथ महात्मा गांधी को भी मान्य थी। इस प्रकार अम्बेडकर और महात्मा गांधी दोनों भारत एक राष्ट्र के दृष्टिकोण से संयुक्त हुए। डॉ. अम्बेडकर और गांधी के विचारों का यह संगम अन्ततः भारत विभाजन की एक अन्य गलती को रोकने में कामयाब हुआ। गलती इसलिए क्योंकि इतिहास ने सिद्ध कर दिया कि धर्म के आधार पर भारत राष्ट्र का कृत्रिम विभाजन कर पाकिस्तान निर्माण एक गलती था। पूना पैक्ट के बाद गांधी और अम्बेडकर भारतीय राजनीति के एक विशेष आयाम (जातिगत शोषण की समाप्ति) में एक दूसरे के पूरक बन गये। महात्मा गांधी यह स्वीकारोक्ति भी करते हैं  कि इस प्रश्न (दलित प्रश्न) को समझाने में अम्बेडकर उनके गुरु रहे, जबकि भारत एक राष्ट्र है, यह समझने में अम्बेडकर के गुरु जाने-अनजाने गांधी बन चुके थे। यही कारण है भारत में स्वतन्त्रता के उषा काल में अम्बेडकर ने मुस्लिम और ईसाई न बनकर बौद्ध धर्म स्वीकार किया। संविधान सभा की ड़्राफ्टिंग कमेटी का चेयरमैन बनना स्वीकार किया और आरक्षण के माध्यम से भारत राष्ट्र की एकता बने रहने का मार्ग प्रशस्त किया।

महात्मा गांधी ने स्वराज्य प्राप्ति के लिए जो अपने रचनात्मक कार्यक्रम प्रस्तुत किये उसमें इन्होंने कौमी एकता (हिन्दू-मुस्लिम एकता) के बाद दूसरा दर्जा अस्पृश्यता निवारण को दिया। इस सम्बन्ध में उनके आशय का सार उनके वक्तव्य के निम्न अंश से समझा जा सकता है -ऐसा कौन है जो आज इस बात से इनकार करेगा कि हमारे हरिजन भाई-बहनों को बाकी के हिन्दू अपने से दूर रखते हैं और इसकी वजह से हरिजनों को जिस भयावनी व राक्षसी अलहदगी का सामना करना पड़ता है उसकी मिसाल तो दुनिया में कहीं ढूँढ़े भी नहीं मिलेगी? यह काम कितना मुश्किल है, सो मैं अपने अनुभव से जानता हूँ, लेकिन स्वराज्य की इमारत को उठाने का जो काम हमने हाथ में लिया है उसी का यह एक हिस्सा है।

महात्मा गांधी ने दलित प्रश्न को अपने स्वराज्य के संघर्ष का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा मानकर लगातार यह प्रयास किया कि कांग्रेस कार्यकर्ता इसे सियासी काम न मानकर हिन्दू- धर्म का अनिवार्य काम मान लें और हर हिन्दू के मन व संस्कार में यह कार्य समाहित कर दें, इस सम्बन्ध में वह लिखते हैं- आज की इस घड़ी में हिन्दू धर्म से चिपटे हुए अस्पृश्यता रूपी शाप और कलंक को धो डालने की आवश्यकता के बारे में विस्तार से कुछ लिखने की जरूरत नहीं। यह सच है कि इस दशा में कांग्रेस वालों ने बहुत कुछ किया है लेकिन मुझे अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि ज्यादातर कांग्रेसियों ने अस्पृश्यता निवारण को, जहाँ तक हिन्दुओं का सम्बन्ध है, खुद हिन्दू धर्म की हस्ती के लिये लाजिमी मानने के बदले उसे एक सियासी जरूरत की चीज माना है। अगर हिन्दू कांग्रेसी यह समझकर इस काम को उठा लें कि इसी में उनकी सार्थकता है तो सनातनी कहे जाने वाले उनके धर्म-बन्धुओं पर जितना असर आज तक हुआ है, उससे कई गुना ज्यादा असर डालकर वे उनका ह्रदय-परिवर्तन कर सकेंगे।

यहाँ यह स्पष्ट है कि गांधी के दृष्टिकोण में दलित प्रश्न महज सियासी प्रश्न न होकर हिन्दू धर्म को मानने वालों में अत्याधिक परिवर्तन का प्रश्न था। इस प्रकार गांधी यहाँ भारत की संत परम्परा का बोध कराते हैं क्योंकि जाति-प्रथा पर प्रहार करते हुए संत कबीर लिखते हैं-

जात-प्रथा को माने न कोय, हरि को भजे सो हरि का होय।

कबीर परम्परा के संत नरसिंह मेहता अपने भजनों में अछूतों के लिए हरिजन शब्द का प्रयोग करते थे, जिसे अछूत भी अपने लिए सही शब्द मानते थे। इसीलिए गांधी दलितों के लिए हरिजन शब्द का प्रयोग करते हैं। यहाँ यह समझना आवश्यक है कि संत परम्परा अंग्रेजों के आने के पूर्व ही भारतीय समाज के सामन्ती अभिशाप जाति प्रथा के खिलाफ अपनी लड़ाई लड़कर जीत चुके थे। इसकी एक अनिवार्य अभिव्यक्ति के रूप में रैदास (चमार) की एक संत के रूप में स्थापना, क्षत्राणी मीरा द्वारा उन्हें अपना गुरू मानना, उनसे मिलने जाना और उनके चरणों में सर रखना, रैदास मन्दिरों की स्थापना होना इत्यादि के रूप में देखी जा सकती हैं। सिक्ख धर्म भी अपने आप में इसी प्रकार की एक अभिव्यक्ति है। महाराष्ट्र में गुरू रामदास के शिष्य शिवाजी ने सैनिक विद्रोह के द्वारा संतों के इस स्तर को राजनैतिक अभिव्यक्ति दे दी थी। लेकिन पेशवाओं द्वारा शिवाजी के रूप में उत्कर्ष प्राप्त कुनबियों को मराठा बनाकर उनका नेतृत्व छीन लिया और समाज के स्तर पर ब्राह्मणवाद की पुर्नस्थापना का प्रतिक्रियावादी प्रयास किया। उसी के परिणाम स्वरूप उस धरती पर ज्योतिबा फुले और अम्बेडकर खड़े हुए और उनके विचारों में सवर्णों के प्रति एक आक्रोश की प्रतिध्वनि है। लेकिन महात्मा गांधी संतों की परम्परा का अनुसरण करते हुए दलित प्रश्न को हल करने के मार्ग पर चलते हैं। यह उनके प्रयासों का ही फल था कि महाराष्ट्र से होकर उत्तर भारत के सभी प्रदेशों में कांग्रेस ही दलितों की पार्टी बनकर उभरी और दलितों का जो विश्वास कांग्रेस पर बना, जिसकी राजनैतिक अभिव्यक्ति जगजीवन राम के रूप में थी, यह विश्वास आजादी के तीस साल बाद टूटना शुरू हुआ। इस टूटन का श्रेय कांशीराम की राजनैतिक निपुणता को दिया जा सकता है। लम्बे काल तक कांग्रेस को दलितों की पार्टी बने रहने का श्रेय एकमात्र महात्मा गांधी के विचार और उनके प्रयासों को दिया जाना कोई अतिश्योक्ति नहीं है।

गांधी विचार को समझने के लिए यह आवश्यक है कि यह जाना जाये कि गांधी किन परिस्थितियों में दलित प्रश्न को हल करने की ओर मुड़े और कितनी दृढ़ता के साथ अपने विचारों का क्रियान्वयन करने का प्रयास उन्होंने किया। यह नमक आन्दोलन के उतार का वक्त था। गांधीजी को गोलमेज सम्मेलन के लिए इंग्लैण्ड बुलाया गया, वहाँ अल्पसंख्यांकों के प्रश्न पर बात करते हुए अंग्रेज मैकडोनाल्ड ने दलित जातियों को भी अल्पसंख्यक बताते हुए उनके लिए भी पृथक निर्वाचन की योजना प्रस्तुत की। गांधीजी मुसलमानों के सवाल पर पृथक निर्वाचन के परिणाम को देख चुके थे और एक राष्ट्रभक्त के नाते वह भारतीय समाज में अन्य दरारें डालना स्वीकार नहीं कर सकते थे। इसलिए इन्हने इसका विरोध किया। इस सम्बन्ध में लेखक हरिभाऊ उपाध्याय लिखते हैं -१७ नवम्बर को मैकडोनाल्ड ने अल्पसंख्यकों के उपयुक्त निर्णय को विधिवत मंजूरी दे दी, इसमें दलित जातियों के लिए भी पृथक निर्वाचन की माँग थी। घास के अन्दर छिपे इस साँपको गांधीजी ने देखा और उसे तुरन्त अपने पैरों के नीचे दबाकर बोले- दलित जातियों के लिए पृथक निर्वाचन की माँग मेरे लिए सबसे अधिक निष्ठुर प्रहार है इसका अर्थ है सदा के लिए जुदाई...

गांधीजी के उक्त कथन में भविष्य को समझने की दृष्टि छिपी है, उनके दृष्टिबोध की सत्यता साबित भी हुई। जब अंग्रेज जाते वक्त भारत का एक और विभाजन अछूतिस्तान के नाम पर करने की योजना प्रस्तुत करते हैं और अम्बेडकर इसका विरोध कर भारत का विभाजन रोक देते हैं। आगामी भविष्य में जब पाकिस्तान पुनर्विभजित हुआ तो यह भी साबित हो गया कि राष्ट्र धर्म और जाति के नाम पर न बनकर भौगोलिक सीमाओं के अन्तर्गत ही निर्मित होते हैं और यह भारत राष्ट्र की विशिष्टता है कि उसमें राज्य आकांक्षाओं का समाधान आरक्षण या राज्य में सुनिश्चित भागीदारी के सिद्धान्त से किया गया। गांधीजी दलितों के हालात के लिए अंग्रेजों को भी जिम्मेदार ठहराते हैं और स्वतन्त्रता के उपरान्त सरकार द्वारा उनके संरक्षण की दृष्टि भी रखते हैं इसलिए वह लिखते हैं-अंग्रेजों ने अपने वेज्ञानिक तरीकों से दलितों और पतितों को जिस भयंकर दलदल में गिरा रखा है, उसमें से उन्हें बाहर निकालने के लिए भारत को स्वतन्त्रता के बाद लगातार बरसों तक कानून बनाते रहना पड़ेगा। यदि उन्हें इस दलदल से बाहर निकालकर राष्ट्रीय सरकार अपने घर को व्यवस्थित करना चाहती है तो सबसे पहले उसे उन तमाम बोझों को उनके कन्धों पर से हटाना होगा जिनके नीचे आज वे पिसे जा रहे हैं।

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रेमजे मैकडोनल्ड जब दलितों के पृथक निर्वाचन के निश्चय से पीछे नही हटे तो भारत आकर गांधीजी ने २० सितम्बर, १९३२ से आमरण अनशन की घोषणा कर दी। इस घोषणा का प्रभाव यह पड़ा कि एक ओर दलित नेता श्री राजा गांधीजी के समर्थन में खड़े हो गये और दूसरी ओर देश भर में मन्दिरों के द्वार हरिजनों के लिए खोले जाने लगे और गांधीजी के अस्पृश्यता निवारण के काम को देश ने अपने हाथ में ले लिया। २० सितम्बर, १९३२ को सारे देश में प्रार्थनाएँ की गयीं और उपवास के पाँचवे दिन पण्डित मदनमोहन मालवीय ने नेताओं की एक परिषद बुलायी, जिसमें सवर्ण नेताओं के साथ अम्बेडकर सहित सभी दलित नेताओं ने भाग लिया। इस सभा में सबने मिलकर एक योजना स्वीकार की, जिसके अनुसार दलित जातियों ने पृथक निर्वाचन का अधिकार त्याग दिया और आम हिन्दू निर्वाचनों से ही संतोष कर लिया। सवर्ण हिन्दुओं ने यह स्वीकार किया कि पृथक निर्वाचन से ब्रिटिश प्रधानमंत्री जितनी सीटें दलितों को देना चाहते थे उससे दुगनी सीटें दलितों को संयुक्त निर्वाचन में आरक्षित की जायेंगी। यह निर्णय ब्रिटिश मंत्रिमण्डल ने भी स्वीकार कर लिया। तब २६ सितम्बर, १९३२ को शाम पाँच बजे श्री रवीन्द्र ठाकुर की उपस्थिति में धार्मिक भजन और प्रार्थना के बाद गांधीजी ने उपवास समाप्त किया।

गधी यहाँ रुके नहीं, उन्होंने हरिजन पत्र का प्रकाशन शुरू किया और हरिजन आन्दोलन के निरन्तर आगे बढ़ने पर उन्होंने ८ मई, १९३२ को पुनः आत्मशुद्धि के निमित्त २१ दिन का उपवास प्रारम्भ किया। इस सम्बन्ध में वह लिखते हैं - यह उपवास अपनी और अपने साथियों की शुद्धि के लिए ह्रदय से की गयी प्रार्थना है, जिससे वे हरिजन-कार्य अधिक जागरुकता और सावधानी के साथ कर सकें। मैं अपने भारत के और संसार के अन्य मित्रों से अनुरोध करता हूँ कि वे मेरे साथ प्रार्थना करें कि मैं इस अग्नि-परीक्षा में सकुशल पार उतरूँ। मैं मरूँ या जीऊँ, जिस उद्देश्य से मैंने उपवास किया है वह पूरा हो। मैं अपने सनातनी भाइयों से अनुरोध करता हूँ कि वे प्रार्थना करे कि इस उपवास का परिणाम मेरे लिये जो कुछ भी हो, कम-से-कम वह सुनहला ढँकना हट जाये जिसने सत्य को ढँक रखा है।

गांधीजी के इस उपवास का प्रभाव कांग्रेस कार्यकर्ताओं पर और देश दोनों पर पड़ा। घबराकर सरकार ने उनके हरिजन पत्र निकालने पर पाबन्दी लगा दी, जिसके लिए गांधीजी को पुनः अनशन करना पड़ा। जिसपर उनकी हालत खराब होने पर सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और १३ दिन बाद बिना शर्त छोड़ दिया। इसके बाद गांधीजी की प्रेरणा से मालवीयजी की अध्यक्षता में बम्बई में एक विशाल आमसभा हुई, जिसमें अस्पृश्यता को दूर करने के लिए एक अखिल भारतीय अस्पृश्यता विरोधी संगठन खड़ा किया गया। श्री घनश्याम दास बिड़ला उसके अध्यक्ष तथा श्री अमृतलाल ठक्कर मंत्री चुने गये। सही संगठन बाद में हरिजन सेवक संघ के रूप में काम करने लगा।

अपने जीवन में अपने उद्देश्यों को चरितार्थ करने की गांधी शैली के अनुरूप गांधी ने एक ढेड (हरिजन) की लकड़ी गोद ले ली और एक ढेड परिवार  को भी आश्रम में बसा लिया। साथ ही उन्होंने यह भी निश्चय किया कि समाज में जो भी सुविधायें हरिजनों के लिए नहीं है, उनका लाभ वे स्वयं भी नहीं लेंगे और जो उनके विचारों के अनुगामी लोग हैं- चाहे परिवार वाले हों या आश्रमवासी- वे भी नहीं लेंगे। उदाहरण के लिए जिन मंदिरों में हरिजनों के जाने का निषेध है, उनका उपयोग वे लोग नहीं करेंगे। १९३३ में ही हरिजन-कार्य के लिए दस महीने देश के हर प्रान्त का दौरा किया। इस दौरे में इस कार्य हेतु आठ लाख रुपया एकत्र हुआ और एक बार २५ जून, १९३५ को पूना में उनकी मोटर पर बम फेंका गया। गांधीजी बाल-बाल बचे। इस घटना में उनकी मृत्यु हो सकती थी। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि गांधीजी के हरिजनों हेतु किये गये कार्यों की प्रतिक्रिया किस स्तर पर थी, फिर भी गांधीजी अपने सम्पूर्ण जीवन में अपने विचार पर अडिग रहे। १९३४ में कांग्रेस को छोड़ते वक्त भी उन्होंने अस्पृश्यतानिवारण को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्थान दिया और हम जानते हैं कि अपने जीवन के अन्त तक गांधीजी अपने रचनात्मक कार्यों को अपने देनिक जीवन का अंग बनाये रहे। इसीलिए वह ज्यादातर हरिजनों के घर पर ही ठहरना पसन्द करते थे। इस प्रकार गांधीजी का जीवन उनके विचारों के क्रियान्वयन का जीवन रहा है। गांधी के हम कर्मपूर्ण जीवन के क्रम में उनके विचार भी समस्या की गहराईकी ओर बढ़ते रहें और वह अछूतों की मुक्ति की बात करने लगे। एक बार अहमदाबाद में दलित वर्ग सम्मेलन में वह बोले-मेरी दो बड़ी इच्छायें हैं, जिनके कारण मैं जीवित हूँ। पहली, अछूतों की मुक्ति और दूसरी गायों की रक्षा। जब मेरी यह दोनों इच्छायें पूरी हो जायेंगी, तभी स्वराज्य मिल जायेगा और उन्हीं की मुक्ति में मेरा मोक्ष भी निहित है।

यहाँ अछूतों की मुक्ति का सवाल महज अस्पृश्यता निवारण नहीं है। यह देश में समानता स्थापित करने का एक सपना है। इसलिए एक बार इंग्लैण्ड में बोलते हुए उन्होंने कहा-अस्पृश्यों की हालत पर जरा गौर तो कीजिए कि आज वह कहाँ हैं। आज उनके पास जमीन नहीं है। वे उच्च वर्ग वालों की- और इसलिए मुझे कहने दीजिये- राज्य की दया पर जी रहे हैं। उन्हें एक जगह से हटाकर कहीं भी दूसरी जगह खदेड़ा जा सकता है। इसकी शिकायत किसी से वे नहीं कर सकते और न कानून ही उनकी कोई सहायता कर सकता है। इसलिए किसी भी प्रकार की समानता लाने के लिए सबसे पहला कदम यह होगा कि उन्हें कहीं-न-कहीं बिना मूल्य लिये जमीन देनी होगी। परन्तु जिनके पास अधिक जमीन है या दूसरे अधिक साधन हैं, उनसे लेकर देनी होगी। इनमें हिन्दुस्तानी भी होंगे, अंग्रेज भी। इसलिए आप हरगिज यह न समझें कि महज अंग्रेज होने के कारण आफ साथ कोई भेदभाव बरता जायेगा। यह नियम तो सभी पर लागू होगा, चाहे वह अंग्रेज हो, जापानी हो, भारतीय हो या और कोई हो।

इस प्रकार हम यह स्पष्ट देख सकते हैं कि दलित प्रश्न पर महात्मा गांधी और डॉ. अम्बेडकर के सपनों में कोई अन्तर नहीं था, लेकिन सपने को यथार्थ में बदलने के मार्ग को लेकर भिन्नताएँ जरूर थीं। जिनके आधार पर आज के दलित चिन्तक इन दोनों को एक दूसरे के विरोध में खड़ा करके देखते हैं। गांधी के ग्राम स्वराज्य पर प्रश्न उठाते हुए प्रायः दलित लेखक लिखते हैं कि गाँवों में दलितों को दबाकर रखा जाता है और यही गांधी का आदर्श है। यह एक मनगढ़न्त आरोप है क्योंकि गांधी अपने ग्रामस्वराज्य को व्याख्यायित करते हुए लिखते हैं-जनता के स्वराज्य का अर्थ है- प्रत्येक व्यक्ति के स्वराज्य से उत्पन्न जनसत्तात्मक राज्य। ऐसा राज्य केवल प्रत्येक व्यक्ति के नागरिकता के नाते उसका जो धर्म है उसका पालन करने से ही उत्पन्न होता है। यहाँ प्रत्येक व्यक्ति में दलित भी शामिल हैं। इसलिए यह समझना चाहिए कि गांधी के स्वराज्य की कल्पना किसी भी सामाजिक शोषण के यथार्थ को बनाये रखने की कल्पना नहीं थी।

अन्ततः यह कहा जा सकता है कि गांधी के विचार और व्यवहार को न समझ पाने के कारण ही दलित चिन्तक अनर्गल प्रश्नों को उठाते हैं जबकि डॉ.अम्बेडकर और तमाम आम दलित समाज गांधी को समझकर उनके साथ राष्ट्रीय आन्दोलन में खड़ा था।

महात्मा गांधी के विचार और प्रयास से भारत के दलित कांग्रेस से जुड़े रहे लेकिन महात्मा गांधी की मृत्यु के बाद कांग्रेस के नेताओं ने दलित प्रश्न को गांधी के दृष्टिबोध या संत परम्परा के क्रम में न समझकर महज सियासी प्रश्न बना दिया। राष्ट्रीय पटल से महात्मा गांधी और डॉ. अम्बेडकर के हट जाने के बाद मात्र वोटों की सौदागरी में फँसे नेता बीस साल के आरक्षण के बाद सामाजिक समता की स्थापना के अम्बेडकर के स्वप्न को पूरा नहीं कर पाये। महात्मा गांधी के दृष्टिबोध से हिन्दू धर्म में सुधार का प्रयास तो दूर की बात थी। इसलिए तीस साल बाद जब दलित बुद्धजीवियों ने कांग्रेस की धोखाधड़ी का पर्दाफाश किया तो दलितों में विक्षोभ की लहरें पुनः उठने लगीं। इन लहरों के आधार पर जब देश में बैठे विदेशी अपने हितों की रोटी सेकने लगे हैं तब यह आवश्यक है कि गांधी विचार के अनुयायी दलित प्रश्न पर गांधी विचार को सामने रखकर उनके बताये मार्ग पर चलें तथा देश और काल के अनुरूप दलित प्रश्न पर चिन्तन कर एक रास्ता निकालें, जिससे भारत राष्ट्र अपनी अक्षुण्णता कायम रख सके और उसमें रहने वाले सभी लोग सामाजिक समानता और स्वतन्त्रता का रसपान कर सकें। सामाजिक भेदभाव का कलंक धुल जाये और सम्पूर्ण समाज रोटी-बेटी के सम्बन्ध से जुड़ सके। गांधी के अनुयायी जयप्रकाश ने १९७४ के सम्पूर्ण क्रान्ति आन्दोलन में ब्राह्मणवाद पर तीखा प्रहार करते हुए जहाँ जनेऊ तोड़ने का आह्वान किया था वहाँ जाति-सूचक चिह्नों का निषेध कर, सामाजिक समरसता कायम करने की कोशिश भी की थी। लेकिन एक बार फिर उनके द्वारा निर्मित अस्र निष्फल रहा और समाज परिवर्तन की भारतीय धारा सूख गयी। भारत का वर्तमान आज जब पुनः परिवर्तन की आहट सुन रहा है और उसमें दलित प्रश्न एक केन्द्रीय प्रश्न के रूप में खड़ा है तब भारतीय संत परम्परा और गांधी मार्ग पर आगे बढ़कर ही वह समाधान प्राप्त किये जा सकते हैं जो भारत राष्ट्र के हितार्थ हों और सामाजिक शोषण का अन्त करते हों।  

स्त्रोत : (सौजन्यः गांधी विचार- गवेषणा, संयुक्तांकः वर्ष-४ जुलाई-दिसम्बर. २००४ अंक २
एवं वर्ष-५ जनवरी-जून, २००५ अंक १)
 

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